Bhagwat Gita Quotes in Hindi — भगवद गीता के अनमोल वचन

भगवद गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर जब अर्जुन दुविधा और दुःख से घिर गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह आज भी हर उस व्यक्ति के काम आता है जो चिंता, क्रोध, असमंजस या थकान से जूझ रहा है।

यहाँ गीता के कुछ सबसे प्रिय श्लोक मूल संस्कृत में दिए गए हैं, साथ में सरल हिंदी अर्थ, अंग्रेज़ी अनुवाद (English translation) और आज के जीवन में उनका उपयोग।

भगवद गीता की 10 छोटी पंक्तियाँ

स्टेटस, डायरी या किसी अपने को भेजने के लिए गीता की कुछ छोटी और गहरी पंक्तियाँ:

  1. “कर्म करो, फल की चिंता मत करो।” — 2.47
  2. “समत्व ही योग है।” — 2.48
  3. “योग कर्मों में कुशलता है।” — 2.50
  4. “मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।” — 6.5
  5. “अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है।” — 6.35
  6. “सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, इन्हें धैर्य से सहो।” — 2.14
  7. “काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं।” — 16.21
  8. “अपना धर्म, कमियों के साथ भी, श्रेष्ठ है।” — 3.35
  9. “ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं।” — 4.38
  10. “शोक मत करो।” — 18.66

गीता की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति का शब्दशः अर्थ पढ़ें: Best line of Bhagwat Geeta।

कर्म पर गीता के श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।

English: You have a right to your actions, but never to their fruits. Do not let the results be your motive, and do not be attached to inaction.

Bhagavad Gita 2.47

आज के लिए: परिणाम की चिंता छोड़कर, जो काम सामने है उसे पूरे मन से करें।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान भाव रखो — इसी समभाव को योग कहा जाता है।

English: Established in yoga, do your work, giving up attachment, balanced in success and failure. This evenness of mind is called yoga.

Bhagavad Gita 2.48

आज के लिए: सफलता और असफलता, दोनों में मन को शांत रखना ही असली योग है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥

अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। बिना कर्म के तो शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं।

English: Do your duty, for action is better than inaction. Without action, even the maintenance of your body would not be possible.

Bhagavad Gita 3.8

आज के लिए: टालमटोल छोड़ें — छोटा सा कदम भी बैठे रहने से बेहतर है।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥

जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह अच्छे-बुरे परिणामों के बंधन से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में लगो — कर्मों में कुशलता ही योग है।

English: One whose understanding is steady moves beyond both good and bad outcomes. Therefore devote yourself to yoga — yoga is skill in action.

Bhagavad Gita 2.50

आज के लिए: डर कम होगा तो काम में कुशलता अपने आप बढ़ेगी।

मन और चिंता पर श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को गिरने नहीं देना चाहिए। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

English: Lift yourself by your own self; do not let yourself sink. You alone are your own friend, and you alone are your own enemy.

Bhagavad Gita 6.5

आज के लिए: खुद से वैसे बात करें जैसे एक अच्छा मित्र करता है।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है, परंतु अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

English: Without doubt, the mind is restless and hard to control. But it can be trained through practice and detachment.

Bhagavad Gita 6.35

आज के लिए: मन भटके तो खुद को डाँटें नहीं — बस धीरे से वापस लाएँ। यही अभ्यास है।

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥

यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से इसे लौटाकर आत्मा के वश में लाना चाहिए।

English: Wherever the restless, unsteady mind wanders, draw it back from there and bring it under the control of the self.

Bhagavad Gita 6.26

आज के लिए: दिन में तीन बार एक गहरी साँस लेकर वर्तमान क्षण में लौटें।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

इंद्रियों और विषयों के संपर्क से सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आते हैं। ये आते-जाते रहते हैं, स्थायी नहीं हैं। इन्हें धैर्य से सहन करना सीखो।

English: Contact with the senses brings cold and heat, pleasure and pain. These come and go and are not permanent. Learn to bear them patiently.

Bhagavad Gita 2.14

आज के लिए: कठिन भावना आए तो याद रखें — "यह भी बीत जाएगा।"

क्रोध और भावनाओं पर श्लोक

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का बार-बार चिंतन करने से उनमें आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

English: When a person dwells on objects, attachment to them is born. From attachment comes desire, and from desire comes anger.

Bhagavad Gita 2.62

आज के लिए: गुस्सा आए तो पूछें — "मैं किस बात की अपेक्षा कर रहा/रही था?"

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से व्यक्ति का पतन हो जाता है।

English: From anger comes delusion; from delusion, confused memory; from confused memory, the loss of reason; and with the loss of reason, one is ruined.

Bhagavad Gita 2.63

आज के लिए: गुस्से में कोई बड़ा निर्णय या संदेश न भेजें — थोड़ा रुकें।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

English: Desire, anger and greed are the three gates to self-destruction. Therefore, give up these three.

Bhagavad Gita 16.21

आज के लिए: ध्यान दें कि काम, क्रोध और लोभ में से कौन सा आपको सबसे ज़्यादा घेरता है।

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जो सुख की लालसा नहीं करता, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।

English: One whose mind is not shaken by sorrow, who does not crave pleasure, and who is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady wisdom.

Bhagavad Gita 2.56

आज के लिए: तनाव भरा संदेश पढ़कर तुरंत जवाब देने से पहले तीन गहरी साँस लें।

वाणी, रिश्ते और आचरण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

जो वाणी किसी को उद्विग्न न करे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा नियमित स्वाध्याय — यह वाणी का तप कहलाता है।

English: Speech that causes no distress, that is truthful, pleasant and beneficial, along with regular study, is called austerity of speech.

Bhagavad Gita 17.15

आज के लिए: बोलने से पहले सोचें — क्या यह सच है, प्रिय है और हितकारी है?

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो मानक स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।

English: Whatever a great person does, others follow. Whatever standard they set, the world goes by it.

Bhagavad Gita 3.21

आज के लिए: ऐसा एक काम करें जिसे कोई और देखकर अपनाए तो आपको खुशी हो।

जीवन का उद्देश्य और आत्मा

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

दूसरे के धर्म को अच्छी तरह निभाने से अपना धर्म, भले ही कमियों के साथ, अधिक श्रेष्ठ है। अपने धर्म में रहकर मरना भी अच्छा है; पराया धर्म भय देने वाला है।

English: Better is your own duty, even imperfectly done, than the duty of another done well. Better to fail in your own path; another’s path is full of fear.

Bhagavad Gita 3.35

आज के लिए: दूसरों से तुलना छोड़कर अपने रास्ते का अगला सही कदम सोचें।

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।

English: The self is never born and never dies. It did not come into being and will not cease to be. Unborn, eternal and ancient, it is not destroyed when the body is destroyed.

Bhagavad Gita 2.20

गीता का मूल संदेश: आप केवल यह शरीर या परिस्थितियाँ नहीं हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

English: Whenever righteousness declines and unrighteousness rises, I manifest myself.

Bhagavad Gita 4.7

गीता का सबसे प्रसिद्ध आश्वासन: अच्छाई कभी अकेली नहीं छोड़ी जाती।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य जुड़े हुए भक्तों का योगक्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

English: To those who think of me with undivided devotion, ever united with me, I bring what they lack and preserve what they have.

Bhagavad Gita 9.22

भरोसे का संदेश: सच्चे मन से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

English: Setting aside all other duties, take refuge in me alone. I will free you from all wrongs. Do not grieve.

Bhagavad Gita 18.66

श्रीकृष्ण का अंतिम आश्वासन — "मा शुचः", यानी शोक मत करो।

इन श्लोकों को जीवन में कैसे उतारें

एक साथ बहुत सारे श्लोक पढ़ना अच्छा लगता है, पर याद कम रहते हैं। बेहतर है कि इस सप्ताह के लिए एक श्लोक चुनें, उसे लिखकर ऐसी जगह रखें जहाँ रोज़ दिखे, और उसका छोटा सा अभ्यास करें।

हमारा निःशुल्क 21-दिन का WhatsApp अनुभव इसी विचार पर आधारित है — छोटे, व्यावहारिक विचार: पहले सप्ताह हर दिन, फिर सप्ताह में तीन बार (फ़िलहाल अंग्रेज़ी में; हिंदी जल्द ही)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन सा है?

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (अध्याय 2, श्लोक 47) सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। इसका अर्थ है कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं।

भगवद गीता में कितने श्लोक हैं?

भगवद गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। यह महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है।

क्या मैं हिंदी में रोज़ गीता का विचार पा सकता/सकती हूँ?

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